बारिश में गरीब का कच्चा मकान गिरा। मुआवजे की उम्मीद लेकर परिवार सरकारी मदद के लिए पहुंचा। लेकिन महिला का आरोप है कि जांच के नाम पर तैनात लेखपाल ने पहले ‘खर्चा-पानी’ यानी रिश्वत मांगी और पैसे न होने की बात कहने पर कथित तौर पर उसकी बेटी को भेजने की आपत्तिजनक मांग कर दी।
मामला उत्तर प्रदेश के रायबरेली के सरेनी ब्लॉक क्षेत्र के मलकेगांव का है। महिला के मुताबिक भारी बारिश के बाद उसका कच्चा मकान गिर गया था। इसकी जांच के लिए लेखपाल मौके पर पहुंचे। आरोप है कि रिपोर्ट लगाने के बदले उनसे पैसे मांगे गए। जब परिवार ने आर्थिक मजबूरी जताई तो लेखपाल ने कथित तौर पर कहा—“पैसे नहीं हैं तो जो लड़की खड़ी है, इसी को भेज दो।”
महिला का आरोप है कि उनकी बात न मानने पर लेखपाल ने रिपोर्ट ही गलत लगा दी और कहा कि उनका मकान नहीं बल्कि उनके चाचा का मकान गिरा है।
पीड़िता की बेटी जब तहसील दिवस पर शिकायत लेकर एसडीएम के पास पहुंची तो उसने आरोप लगाया कि उसकी बात को गंभीरता से लेने के बजाय अधिकारी कथित तौर पर हंसते रहे। युवती ने भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए यहां तक कहा कि अगर उसे न्याय नहीं मिला तो वह आत्महत्या कर लेगी।
यह आरोप बेहद गंभीर हैं। सवाल सिर्फ एक लेखपाल पर नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर है जहां आपदा में घर गंवा चुका गरीब मुआवजे के लिए सरकारी दफ्तर पहुंचता है और बदले में कथित रिश्वत या अपमानजनक व्यवहार का सामना करने का आरोप लगाता है।
हालांकि, एसडीएम लालगंज राजेश कुमार श्रीवास्तव ने जिलाधिकारी को पत्र भेजकर आरोपों को खारिज किया है। वहीं, सीओ लालगंज सुजीत राय ने जांच के बाद कहा कि लड़की को भेजने और रिश्वत मांगने के आरोप सही नहीं पाए गए।
अब सवाल यही है—अगर आरोप गलत हैं तो शिकायतकर्ता की पीड़ा और उसके गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच कितनी पारदर्शी तरीके से हुई? और अगर आरोप सही नहीं हैं, तो ऐसे आरोप लगाने की नौबत आखिर आई क्यों?
